पिताजी
हम सभी भाई पिताजी को
गाहे- बगाहे कोसते रहते थे
पिताजी ने कुछ नहीं किया
जबकि वे बहुत कुछ कर सकते थे
जब शहर में जमीन सस्ती थी
और फसल भी अच्छी ही होती थी
तब भी उन्होंने
शहर में जमीन का एक टुकड़ा तक नहीं खरीदा
थोड़े- थोड़े भी यदि बचाते तो
वे ऐसा आसानी से कर सकते थे
वे जीवन भर बेढंगी चाल से ही चलते रहे
उन्होंने बैंक का मुंह कभी नहीं देखा
उनकी जेब ही उनका बैंक था
फसल की बिक्री के पैसे
या फिर आम के बाग से मिले पैसे
सभी जेब के ही हवाले होते थे
जेब में पड़े पैसे
वे फिर कभी गिनते नहीं थे
बस खर्च करते थे
और नयी फसल के आने के कुछ पहले ही
उनकी जेब खाली हो जाती थी
लेकिन उनके चेहरे पर कभी भी इसका मलाल नहीं होता था
वे उसी तरह चेहरे पर परम संतोष का भाव लिये
विचरते रहते थे
लाख संकटों में भी उन्होंने
कभी आसमान को नहीं कोसा और
न ही धरती की पूजा करना कभी भूले
हम सभी भाई जैसे तैसे
गाँव के स्कूल में पढ़ते रहे
उन्होंने न कभी पढ़ाई
और न ही कभी रिजल्ट के बारे पूछा
उनकी साफ समझ थी कि
जो पढ़ने वाले होते हैं
वे मुश्किलों में भी पढ़ ही लेते हैं
उनके पास ऐसे कई उदाहरण थे
एक तरह से कहें तो हमलोगों की नजर में
पिताजी हर मामले में शून्य ही रहे तब तक
जब तक कि शून्य में विलीन नहीं हो गये
अब हम सभी भाई पिताजी हैं
नौकरी से इतना नहीं हो पाता है कि
कोई भी जग प्रयोजन ठीक से कर सकें
किसी भी जरूरी जरूरतों के लिये
पिताजी द्वारा बचाई गयी पुस्तैनी जमीन को ही
थोड़ा- थोड़ा बेचते रहते हैं
हर पल जीवन व्याकुलता में ही व्यतीत होता है
गाँव में पुस्तैनी मकान जो कि अब खंडहर हो चुके हैं
उसे जब भी कभी देखता हूँ तो
पिताजी के संतोषी चेहरे के मर्म को समझने की कोशिश करता हूँ
ऐसे समय पिताजी बहुत याद आते हैं
अब अंत में अब क्या कहें
गाँव तो गंवा ही दिया
शहर में अभी तक जमीन नहीं ले पाये
चन्द्रकांत राय